मंत्रीपरिषद का गठन कैसे होता है ? मंत्रिमंडल व मंत्रिपरिषद में अंतर

आज की इस पोस्ट में हम 'मंत्रीपरिषद' टॉपिक पर पूरी जानकारी  देंगे। इस टॉपिक पर जुड़े बहुत से सवाल और उनके जबाव भी इस पोस्ट में शामिल किये गये है। मंत्री परिषद और मंत्रीमण्डल में अंतर क्या है ? इसके बारे में इस पोस्ट में विस्तार से बताया गया है।


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मंत्रीपरिषद का अर्थ क्या होता है ?


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 में उल्लेख है कि "राष्ट्रपति को उसके कार्यों को पूर्ण करने में सहायता और परामर्श देने के लिए एक मंत्रीपरिषद होगी,जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।

मंत्रीपरिषद को इंग्लिश में "Council Of Ministers" भी कहा जाता है।

संविधान के अनुछेद 75 में मंत्रीपरिषद की रचना से संबन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया है जो निम्न है -

1 - प्रधानमंत्री की सलाह से राष्ट्रपति अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेगा।
2 - सभी मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बने रहेगे।
3 - मंत्रीपरिषद समूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी।
4 - प्रत्येक मंत्री को पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ लेनी होगी।
5 - यदि कोई मंत्री अपना पद धारण करने के 6 माह बाद तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं बन सका तो उसे मंत्री परिषद से त्याग पत्र देना होगा।

इसका मतलब है की मंत्रीपरिषद में शामिल मंत्री संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में से किसी के भी सदस्य होने चाहिए। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया जाता है जो सदन के दोनों सदनों का मंत्री नहीं है तो उसे मंत्रीपरिषद में मंत्री बनने के बाद 6 महीने के अंदर संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनना होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो अपना इस्तीफा देना होगा।

6 - मंत्रियों को वो सभी वेतन और भत्ते प्राप्त होंगे जो समय - समय पर संसद विधि द्वारा निर्धारित करे।


मंत्रीमंडल में कुल कितने सदस्य/मंत्री होते है ?


भारत के मूल संविधान में मंत्रीमंडल में मंत्रियों की संख्या निश्चित नहीं की गयी थी। लेकिन 91वें संवैधानिक संशोधन ( 2003 ) के आधार पर यह व्यवस्था की गयी है कि प्रधानमंत्री सहित मंत्रीपरिषद के सदस्यों की संख्या लोकसभा की कुल सदस्यों की संख्या के 15 % से अधिक नहीं हो सकती है।

मंत्री परिषद में कितने प्रकार के मंत्री होते है ? मंत्री परिषद का गठन कैसे होता है ?


मंत्री परिषद का प्रधान/मुखिया प्रधानमंत्री होता है। मंत्रिमंडल में अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करने के लिये प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देता है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के कहे अनुसार ही संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में से सदस्यों को या किसी अन्य व्यक्ति को मंत्रीपरिषद में नियुक्त करता है।

यदि मंत्रीपरिषद में ऐसा कोई सदस्य शामिल किया जाता है जो संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो उसे 6 महीने के अंदर संसद का सदस्य बनना पड़ेगा। अन्यथा उसे मंत्री परिषद में से इस्तीफा देना पड़ेगा।

मंत्री परिषद में पाँच स्तर के सदस्य होते है।

प्रथम स्तर के सदस्य - यह मंत्रीपरिषद के प्रथम स्तर के सदस्य मंत्री होते है। इनकी संख्या 12 से 32 तक हो सकती है। इन सभी सदस्यों को मुख्य रूप से समूह में "मंत्रीमण्डल ( कैबिनेट )" कहते है। ये सभी मंत्री किसी न किसी विभाग के अध्यक्ष होते है।

जैसे - गृह मंत्री,विदेश मंत्री आदि

द्वितीय स्तर के सदस्य - कुछ सदस्य ऐसे होते है जिनको मंत्रिमंडल के सदस्य जैसे अधिकार व वेत्तन,भत्ता आदि तो मिलते है लेकिन यह मंत्रीमंडल के सदस्य नहीं होते है। यह मंत्री भी विभागों के अध्यक्ष होते है। लेकिन मंत्रीमंडल की बैठकों में यह भाग नहीं लेते है,केवल प्रधानमंत्री के बुलावे पर ही यह बैठक में उपस्थित हो सकते है।


तृतीय स्तर के सदस्य - यह सदस्य राज्यमंत्री होते है। यह विशेष विभागों से संबद्ध रहते है। कभी - कभी इनको किसी विभाग के स्वतंत्र प्रभार के रूप में कार्य सौंप दिये जाते है। भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यमंत्री स्वतंत्र भी हो सकता है और केबिनेट मंत्री के सहायक के रुप में भी कार्य कर सकता हैं।

चौथे स्तर के सदस्य - यह उपमंत्री होते है। यह बड़े स्तर के मंत्री के अधीन रहकर उनकी सहायता करते हैं।

पांचवें स्तर के सदस्य - यह उपमंत्रियों के नीचे के स्तर में संसदीय सचिव होते है। ये विभागीय मंत्रियों को प्रशासनिक तथा विशेष रूप से संसदीय कार्यों के संबंध में सहायता उपलब्ध करवाते है।

यह पांचों स्तर के मंत्रियों को समूहिक रूप से ही "मंत्रीपरिषद" के नाम से संबोधित किया जाता है।

मंत्रिमंडल क्या होता है ? मंत्रीमंडल ( कैबिनेट ) के मंत्री


मंत्रीपरिषद में पाँच स्तर के सदस्य होते है। उनमें से जो प्रथम स्तर के मंत्री होते है जो प्रमुख विभाग के अध्यक्ष होते है, उन सभी को सामूहिक रूप से मंत्रीमंडल ( कैबिनेट ) कहते है। मंत्रिमंडल के सदस्य कैबिनेट मंत्री कहलाते है।

मंत्रीमंडल मंत्रीपरिषद का एक भाग है। यह मंत्रीपरिषद का भीतरी चक्र है,यह मंत्री परिषद की सबसे अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक समिति के रूप में काम करता है।

मंत्री मण्डल की शक्तियां व कार्य -

मंत्री मण्डल में शामिल सभी मंत्री किसी न किसी विभाग के अध्यक्ष होते है। इनका प्रमुख कार्य अपने विभाग से संबन्धित नीतियाँ बनाना और फैसले लेना है। जैसे विदेश मंत्री का कार्य होता है,भारत का अन्य देशों से संबंध संबंधी नीति बनाना आदि

मंत्री मण्डल की शक्तियां व कार्य निम्न प्रकार का होता है - 

1 - राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करना
2 - राष्ट्रीय कार्यपालिका पर सर्वोच्च नियंत्रण
3 -वित्तीय कार्य,आर्थिक नीति का निर्धारण
4 - विदेशों के साथ सम्बन्धों पर नियंत्रण
5 - नियुक्ति संबन्धित कार्य

मंत्रीमण्डल की बैठके 

मंत्रीमंडल की बैठके प्रधानमंत्री की इच्छानुसार होती है। साधारण रूप से मंत्रीमंडल की बैठक सप्ताह में एक बार होती है,लेकिन विशेष परिस्थिति में एक सप्ताह में यह दो बार भी आयोजित की जा सकती है। बैठक का सभापित प्रधानमंत्री होता है। बैठको की समस्त कार्यवाही गुप्त रखी जाती है। सभी सदस्यों को इस बैठक में लिए नए निर्णय स्वीकार करने होते है । यदि कोई सदस्य बैठक में लिए गये निर्णयों का विरोध करना चाहता है तो उसे मंत्रीमंडल में से त्याग पत्र देना पड़ता है।

मंत्रीमंडल और मंत्रीपरिषद में क्या अंतर होता है ?


मंत्रीपरिषद में पाँच स्तर के सदस्य होते है। इन सभी सदस्यों को सामूहिक रूप से मंत्रीमंडल कहते है। जबकि मंत्रिमंडल में केवल प्रथम स्तर के मंत्री ही शामिल होते है। जिसे कैबिनेट के मंत्री कहते है।

मंत्रिमंडल मंत्रीपरिषद की एक आंतरिक समिति होती है। मंत्रीपरिषद के सदस्यों की संख्या 50 से 75 हो सकती है। जबकि मंत्रिमंडल में मंत्रीपरिषद के सदस्यों में से केवल 12 से 32 सदस्य ही शामिल होते है।

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