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Thursday, 26 December 2019

ईसाई धर्म का इतिहास,संस्थापक,नियम,शिक्षा,धर्म ग्रंथ की पूरी जानकारी

Amojeet - Hindi Blog पर आप सभी का स्वागत है। आज की इस पोस्ट में हम आपको ईसाई धर्म के बारे में पूरी जानकारी देने वाले है। ईसाई धर्म की स्थापना कैसे और कहाँ से हुयी और ईसाई धर्म के क्या नियम है। इन सभी प्र्शनों का जबाव आपको आज की इस पोस्ट में मिल जायेगा।

जैसा की आप सभी जानते है की भारत में सबसे अधिक लोग "हिन्दू धर्म" को मानते है लेकिन विश्व में सबसे अधिक लोग ईसाई धर्म  को मानते है। आप यह भी कह सकते है की विश्वभर में ईसाई धर्म के अनुयायी सबसे अधिक संख्या में है। इसी कारण बहुत से लोग इस धर्म के बारे में विस्तारपूर्वक जानने के इच्छुक रहते है।

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ईसाई धर्म की शुरुवात कब और कैसे हुयी ? ईसाई धर्म का क्या इतिहास है ?


ईसाई धर्म के बारे में जानने से पहले आपको यहूदी धर्म के बारे में भी जानना होगा।

यहूदी धर्म - यह धर्म विश्व के सबसे प्राचीन माने जाने वाले धर्मो में से एक है, इसे दुनिया का प्रथम एकेश्वरवादी धर्म ( ईश्वर एक है का सिद्धान्त ) माना जाता है। इस धर्म में ईश्वर और उसके नबी यानि पैग़म्बर ( नबी का मतलब "ईश्वर का मनुष्य' होता है ) की मान्यता प्रधान मानी जाती है। यहूदी धर्म ईसा पूर्व 9वीं शताब्दी काल का माना जाता है।

ईसाई धर्म भी यहूदी धर्म परंपरा से निकला एक धर्म है जो एकेश्वरवादी धर्म ( ईश्वर एक है का सिद्धान्त ) पर विश्वास रखता है। इस धर्म की शुरूआत प्रथम सदी ई. में फलिस्तीन में मानी जाती है। इस धर्म को मानने वाले लोग ईसाई कहलाते है। इनका धर्मग्रंथ "बाइबिल" है।

फ़िलिस्तीन उस क्षेत्र का नाम है जो लेबनान और मिस्र के बीच का क्षेत्र था। अब इस क्षेत्र पर इज़राइल ने कब्जा कर लिया है। यह क्षेत्र यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों तीनों धर्म को मानने वाले के लिए पवित्र माना जाता है।

ईसाई धर्म को English में Christianity कहते है। और जो इस धर्म के उपासक है उनको Christians कहा जाता है।

ईसाइयों में मुख्ययतः तीन प्रकार के समुदाय आते है,जिनका वर्णन नीचे किया गया है।

  • कैथोलिक
  • प्रोटेस्टेंट 
  • ऑर्थोडॉक्स


1 - कैथोलिक कलीसिया -  ईसाई धर्म में वैश्विक ईसाई कलीसिया एक मुख्य शाखा है। इस शाखा के अनुयायी रोम के वैटिकन नगर के पोप को अपना धर्माध्यक्ष ( गुरु ) मानते हैं। रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म गुरु को पोप कहते हैं। 'पोप' का शाब्दिक अर्थ 'पिता' होता है। इनको 'होली फादर' भी कहा जाता है।

2 - प्रोटेस्टेंट संप्रदाय - यह भी ईसाई धर्म की एक शाखा है। इसका उदय सोलहवीं शताब्दी में हुया था। यह शाखा "कैथोलिक कलीसिया ईसाई धर्म शाखा" का विरोध करती है। यह उनके विरुद्ध है। इस शाखा के लोग धर्मशास्त्र ( बाइबल ) को ही उद्घाटित सत्य मानते है। इस शाखा के अंतर्गत लूथरन, कैलविनिस्ट, एंग्लिकन, बैप्टिस्ट और मेथोडिस्ट पाँच संप्रदाय आते है। यह पूरी तरह से पवित्र बाइबल में पूरी श्रद्धा रखते हैं

3 - ऑर्थोडॉक्स - यह भी ईसाई धर्म के प्रमुख तीन सम्प्रदायों में से एक है। 11वीं सदी तक पश्चिम में लैटिन, और पूरब में ग्रीक तक यह था। इस संप्रदाय के लोग भी पश्चिमी कैथोलिक से अलग हो गए तथा पोप की सत्ता को अस्वीकार करते है।

ईसाई धर्म के अनुसार यह चार चीजे पूरी तरह से पाप मानी जाती है।

मूर्तिपूजा - ईसाई धर्म को मानने वाले लोग मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रखते है।

हत्या - किसी भी प्रकार की हत्या करना पाप माना जाता है।

व्यभिचार - किसी के साथ अच्छे तरीके से आचरण न करके उसको बुरा - भला कहना,उसको सम्मान न देना भी पाप की श्रेणी में आता है।

किसी को भी व्यर्थ आघात पहुंचाना - इस संसार में निवास करने वाले किसी भी प्राणी को व्यर्थ आघात पहुंचाना भी इस धर्म के अनुसार पाप की श्रेणी में आती है।

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ईसाई धर्म का एकेश्वरवादी धर्म सिद्धान्त क्या है ? 


जैसा की हम आपको ऊपर जानकारी देकर आये है की - ईसाई धर्म एक एकेश्वरवादी धर्म है। जिसका मतलब होता है की,ईश्वर एक होता है। जो इस पूरे संसार को चलाता है। वो सर्वव्यापी है। सब प्राणी जो जीवन जीते है वह उसकी देन है।

लेकिन ईसाई धर्म के लोग एक ईश्वर के रूप को तीन रूप में स्वीकार करते है। उनका मानना है की इस संसार में ईश्वर तीन रूपो में है। जो निम्न है -

  • 1 - परमपिता 
  • 2 - ईसा मसीह
  • 3 - पवित्र आत्मा 
इन सबकी जानकारी कुछ इस प्रकार है ।

1 - परमपिता - परमपिता इस दुनिया की रचना करने वाला है। वह ही इस दुनिया को चलाते है।

2 - ईसा मसीह - ईसा मसीह उस परमपिता के पुत्र थे। जो जन्म लेकर इंसानी देह ( देह - शरीर ) में इस संसार पर आये थे। ईसा मसीह का जन्म इस संसार में इसलिये हुया था की वह मनुष्यों के अन्दर के पापों को खत्म करें।

3 - पवित्र आत्मा - यह हर किसी प्राणी के शरीर में निवास करती है। इसी पवित्र आत्मा के प्रभाव में व्यक्ति अपने अन्दर ईश्वर का अहसास करता है।

ईसाई धर्म संस्थापक ईसा मसीह कौन थे ? ईसा मसीह के बारे में जानकारी - ईसा मसीह का जन्म व जीवन 


ईसा मसीह स्वयं परमेश्वर के पुत्र है। जिनका जन्म मनुष्य के अंदर के पाप को खत्म करने के लिये हुया था। उन्होने मनुष्य की रक्षा करने के लिये अपने शरीर की कुर्बानी दी थी। उनको ही "प्रभु यीशु" के नाम से पुकारा जाता है। "प्रभु यीशु" ( God Jesus ) ईसाई धर्म का आधार माने जाते है।

ईसा मसीह या प्रभु यीशु का जन्म और जन्म स्थान - 

ईसा मसीह एक यहूदी थे जो इजराइल के गाँव बेत्लहम में जन्मे थे। ईसाई धर्म के अनुयायी मानते हैं कि ईसा मसीह की माता मारिया ( जिनका नाम "मरियम" भी लिया जाता है ) कुवांरी (वर्जिन) थीं। ईसा उनके गर्भ में परमपिता परमेश्वर की कृपा से चमत्कारिक रूप से आये थे। ईसा मसीह का जन्म 4 ईसा पूर्व माना जाता है।

कुछ यहूदी नबियों ने ईसा मसीह के जन्म से पहले ही भविष्यवाणी की थी कि एक मसीहा  जन्म लेगा। जो इस संसार की बुरी शक्तियों से रक्षा करेगा।

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ईसा मसीह का जीवन - 

ईसा मसीह ने इजराइल में यहूदियों के बीच प्रेम का संदेश सुनाया और कहा कि वो ही ईश्वर के पुत्र हैं। वो सभी को प्रेम भाव से रहने का संदेश देते थे। उनके उपदेशो को मानने वाले उनके अनुयायी शिष्य भी उनके साथ ही रहते थे।

लेकिन ईसा की इन बातों पर पुराणपंथी यहूदी धर्मगुरु भड़क उठे और उनके आदेशानुसार इजराइल के रोमन राज्यपाल ने ईसा को क्रूस ( † ) पर चढ़ाकर मारने का आदेश अपने सैनिको को दे दिया था।

ईसाई मानते हैं कि क्रूस ( † ) पर चढ़ाने के तीन दिन बाद ईसा का पुनर्जन्म हुआ था। यीशु एक साथ प्रार्थना कर रहे सभी 12 शिष्य और कुल मिलाकर 40 लोगों के सामने पुनर्जन्म लेकर प्रगट हुये थे।

ईसाई धर्म का पवित्र ग्रंथ "बाइबिल" -


ईसाई धर्म की पवित्र धर्म ग्रंथ पुस्तक "Bible" है। ईसाई धर्मग्रन्थ बाइबिल में दो भाग हैं। पहला भाग "पुराना नियम" है, जो कि यहूदियों के धर्मग्रंथ "तनख़" का ही संस्करण रूप है। दूसरा भाग "नया नियम" कहलाता तथा ईसा के उपदेश, चमत्कार और उनके शिष्यों के कामों का वर्णन करता है।

ईसाई धर्म के लोग बाइबिल के "नया नियम" भाग में वर्णित सभी उपदेशों,शिक्षाओं,आदेशों,नियमों को मानते है। इस भाग में ही "प्रभु यीशु" के जीवन की जानकारी,शिक्षाओं,उनके शिष्यों आदि से संबंधित जानकारी प्राप्त होती है ।


ईसाई धर्म के नियम,ईसाई धर्म की शिक्षा [ ईसाई धर्म के सिद्धान्त जो हर एक ईसाई अनुयायी को अपनाने चाहिये ? [ Christianity Rules in Hindi, Christianity teaching [Principles of Christianity which every Christian follower should adopt ? ] 


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ईसाई धर्म के बारे में जानकारी इन हिन्दी में प्राप्त करने के बाद हम आपको इस धर्म से संबंधित कुछ ऐसे नियमों की जानकारी देने वाले है जो हर एक ईसाई अनुयायी को मानने चाहिये।

हर धर्म के कुछ अपने नियम,सिद्धान्त होते है। ठीक उसी प्रकार ईसाई धर्म के भी कुछ महत्वपूर्ण नियम है जो निम्न प्रकार से है -

1 - ईश्वर ब्रह्मांड का राजा और ब्रह्मांड का निर्माता है और इस पर संप्रभु है,इसलिए सभी लोग अंततः परमेश्वर के प्रति जवाबदेह हैं।

2 - ईश्वर का वचन सत्य है, क्योंकि ईश्वर वही है, जिसने सत्य की स्थापना की है। यह सच्चाई बाइबिल में पाई गई है। इस शब्द के द्वारा हम ईश्वर के प्रभु शासन को राजा के रूप में, हमारी मुक्ति की आवश्यकता को समझते हैं, और ईश्वर को मसीह में हमारे उद्धारकर्ता के रूप में देखते हैं।

3 - ईश्वर के सार्वभौम शासक के रूप में, उसके पास अंतिम अधिकार है, वह अकेला न्याय का अंतिम मध्यस्थ है। इसलिए, सभी जीव, ईसाई और गैर-ईसाई, का नैतिक दायित्व है कि वह अपने कानूनों का पालन करें।

4 - हर एक व्यक्ति, पुरुष और महिला, हर जाति और राष्ट्रीयता में ईश्वर का प्रतिरूप है और ईश्वर के समक्ष समान है। इसका अर्थ मुख्य रूप से यह है कि मनुष्य पृथ्वी पर भगवान के शासन को प्रतिबिंबित करने के लिए पृथ्वी पर प्रभुत्व लेने के लिए बना है। इसलिए ईसाई नैतिक प्राणी हैं।

5 - जिस व्यक्ति ने ईश्वर के नैतिक नियम को तोड़ कर पाप किया है। वह नरक में आध्यात्मिक मृत्यु के योग्य है।  नैतिक कानून में कई पापों को शामिल किया गया है जिसमें चोरी करना, लालच देना, मूर्ति पूजा करना, व्यभिचार करना।

6 - हर एक व्यक्ति को अपने पाप के लिए पश्चाताप करना चाहिए और उद्धार के लिए यीशु मसीह पर भरोसा करना चाहिए। केवल यीशु मसीह, सही कानून-रक्षक और प्रायश्चित-निर्माता, भगवान के क्रोध और पाप के लिए दंड से एक वैध शरण है। जो व्यक्ति प्रभु यीशु का नाम लेता है उसके पाप मिट जाते है।

7 - ईसाईयों को किसी से "घृणा" नहीं करनी चाहिये। बल्कि ईसाई धर्म की शिक्षा हमें यह सिखाती है कि हमें यीशु मसीह के प्रेम को ईश्वर और पड़ोसी से प्यार करने के लिए मजबूर करना चाहिए। यीशु ने उन लोगों को भी प्यार किया और माफ कर दिया जिन्होंने उन्हें मार डाला था।

8 - अंधकार हमेशा प्रकाश से आगे निकलने का प्रयास करता है और शैतान हमेशा सत्य को विकृत करने का प्रयास करता है। लेकिन ईसाई के लिए, ईसा मसीह ने हमें अंधेरे से अपने प्रकाश में बुलाया है।

9 - सबसे कठोर पापी, विशेष रूप से जो ईश्वर और ईश्वर के नियमों से घृणा करते हैं, वे ईश्वर की कृपा की पहुंच से बाहर नहीं हैं। वे भी ईश्वर को प्राप्त कर सकते है लेकिन उनको सबसे पहले "प्रभु यीशु" के नियमों को मानना होगा।

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